Tuesday, August 7, 2018

अस्थाई जीवन मे स्थायी नौकरी

"अस्थाई जीवन में स्थायी नौकरी की कल्पना"-

गज़ब*
        आज कल स्थायी नौकरी का बड़ा ट्रेंड है। ये एक सामाजिक बीमारी की तरह है जो हमारे अच्छे विकास की दिशा में बाधक है। ये सामाजिक बीमारी हमारे समाज द्वारा ही फैलाई गयी है। यदि आपके पास स्थायीनौकरी है तो समाज में आपका एक अलग ही रुतबा, अलग ही सम्मान होता है। जबकि अस्थायी नौकरी वाले व्यक्ति की स्थिति कुछ दीन-हीन सी नज़र आती है। ये चीज हमारे आसपास के लोगों ने ही हमारे दिमाग में भर दी है कि अगर एक स्थायी नौकरी है तो आप योग्य हैं,सफल हैं और अगर आपके पास स्थायी नौकरी नहीं है तो आप असफल तो हैं ही साथ ही साथ आपको अयोग्यता का प्रमाण पत्र भी दे दिया जाता है। समाज के द्वारा दी गयी ये बीमारी व्यक्ति के, परिवार के विकास को तो खा ही जाती है साथ ही साथ ये देश के विकास को भी खा जाती है। इसके कारण कोई भी युवा एक सीमित दायरे में ही सोचने पर मजबूर होता है। वह उस सीमित दायरे से बाहर सोचने की हिम्मत भी नहीं कर पाता क्योंकि यदि वो ऐसा करता है तो ये समाज उसकी असफलता का, उसकी अयोग्यता का सर्टिफिकेट लिए ही बैठा है।अगर ये स्थाई नौकरी का चक्कर न हो तो हमारे देश का युवा बाहरी सीमाओं को तोड़कर, अपनी सीमाओं, क्षमताओं और रुचि को पहचानकर कुछ अलग ही कर सकता है।इस 70-80 साल की अस्थाई, अस्थिर, क्षणभंगुर जिंदगी में एक स्थायी नौकरी की कल्पना कितनी हास्यास्पद है। जब जिंदगी ही अस्थिर है तो नौकरी की स्थिरता कहाँ से हो सकती है। क्या स्थिरता 30- 40 साल का नाम है? यदि नहीं तो फिर स्थिर या स्थायी नौकरी की बात एकदम बेमानी है।इस स्थायी नौकरी के चक्कर की शुरुआत कहाँ से हुई? जब तक राजाओं का शासन था तब तक तो ऐसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था। राजा के यहाँ नौकरी जरूर होती थी लेकिन उसके स्थायित्व की कोई गारंटी नहीं होती थी। जब से हम आजाद हुए तभी से हमारी प्रतिभाओं को खाने वाली ये स्थायी नौकरी आयी है। इसका मतलब ये है कि ये एक सामाजिक बीमारी है जो हमने खुद अपने मस्तिष्क से पैदा की है।अगर आज हम देखें तो अमेरिका जैसे देशों में फ्रीलांस जॉब्स का चलन बढ़ा है। वहाँ करीब 4 करोड़ लोग इस तरह की नौकरी कर रहे है जबकिभारत में ऐसे काम करने वालों की संख्या 1 करोड़ ही है। इसीलिए हम आजादी के बाद भी इतने कम विकसित हैं।कोई युवा जब स्थायी नौकरी के पीछे भागता है तो वो औसतन अपने 25 वर्ष तो गँवा ही देता है। अब बाकी के 25 साल वो एक निश्चित दिनचर्या के हिसाब से अपना जीवन गुजार देगा। यदि वो खुद का मूल्यांकन करे कि उसने इस समाज को क्या दिया, खुद के लिए क्या किया तो शायद इस बात का उत्तर उसके पास न हो। या उत्तर में सिर्फ यही कह सकता है कि मेरे पास गाड़ी है, अपना घर है, बैंक बैलेंस है। और??? समाज के लिए,,,,परिवार के लिए आपने क्या किया??? कुछ नहीं!!हमें ये सोचना होगा कि यदि हमने जन्म लिया है तो क्यों जन्म लियाहै। क्या ये अमूल्य जीवन किसी की नौकरी करने के लिए है या फिर इस समाज को कुछ दे जाने के लिए है, अपने लिए कुछ अद्भुत सा काम करने के लिए है। जब हम मरें तो अपने आप से ये पूछें कि हमने पूरे जीवन भर क्या किया?? हम खुद क्या लेकर जा रहे हैं?? इस समाज को क्या देकर जा रहे हैं?यदि इन प्रश्नों का उत्तर आपके पास उस समय रहेगा तब तो आपका जीवनसार्थक रहा। लेकिन यदि आपने पूरी जिंदगी रोटी कमाई और खाई है तो इतना तो पशु भी कर लेते हैं फिर आपके जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा औऱ इस दुनिया को भी आपके जीने मरने से कोई फर्क नहीं पड़ताइसलिए हमें चाहिए कि हम लोगों की मानसिकता को बदलें। अपनी मानसिकता कोबदलें। स्थायी नौकरी मिलती है तो ठीक यदि नहीं मिलती है तो उसके पीछे भागना बन्द करें और कुछ ऐसा काम करें जिसमें आपकी रुचि हो और जिससे आप समाज के लिए कुछ दे सकें। यदि आप इतना नहीं कर सकते तो कम से कम इतना तो अवश्य करें कि किसी अस्थायी नौकरी वाले व्यक्ति को हतोत्साहित न करें, उसे उसका काम पूरी ईमानदारी के साथ करने दें। वरना ये स्थायी नौकरी का कॉन्सेप्ट हमारी प्रतिभाएँ खा जाएगा।
*आप क्या बन गये हैं ये महत्वपूर्ण नहीं है, आप समाज को क्या दे रहे हैं, दूसरों के लिए क्या कर रहे हैं ये महत्वपूर्ण है।*

Tuesday, July 31, 2018

कानजी स्वामी गुरुदेव कहना कितना सही????

*कानजी स्वामी को गुरुदेव कहना कितना सही?*

   *कानजी स्वामी* जैन जगत में पिछले 50 वर्षों में सबसे ज्यादा प्रभावी नाम जिसने जैन समाज को एक नवीन दृष्टि प्रदान की तथा समस्त कर्मकांडों की होली जलाते हुए जैनियों को उनकी अमूल्य निधियों से अवगत कराया।
      प्रारम्भ में तो ये श्वेतांबरों के मुखपट्टीधारी मुनि रहे किन्तु कालांतर में मोक्षमार्गप्रकाशक एवं समयसार जैसे ग्रन्थों के मिलने पर तत्त्वबोध हुआ और उन्होंने मुखपट्टी छोड़कर श्वेताम्बर मुनिपद का त्याग किया तथा दिगम्बर धर्म को स्वीकार किया।
    दिगम्बर धर्म में आगमन के समय ये गुजरात में ही निवासरत थे जहाँ श्वेतांबरों की ही प्रधानता है। इन्होंने श्वेताम्बर मुनिपद एवं मुखपट्टी दोनों का ही त्याग कर दिया था। और एक सामान्य गृहस्थ की भाँति ही जीवन व्यतीत कर रहे थे। परंतु जीवन भर ब्रम्हचर्य का पालन करते हुए आ रहे थे तो अभी भी ब्रम्हचारी ही थे और श्वेत वस्त्र धारण करते थे तो उनसे कुछ श्रद्धा में तो बिगाड़ था नहीं सामान्य वेश ही था तो श्वेत वस्त्र भी धारण करते रहे।
    गुजरात के कुछ लोग जिनको ये पता था कि ये साधु थे तो सामान्य जन अभी भी उन्हें श्वेत वस्त्र देखकर साधु ही समझते थे किंतु वे तो स्वयं को एक ब्रम्हचारी ही मानते थे साधु नहीं।
     वे वहीं रहकर स्वाध्याय करते तो कुछ लोग उनके पास आकर स्वाध्याय सुनने लगे। वहाँ प्रारम्भ में जो लोग आये वे उन्हें सामान्य शिष्टाचारवश गुरुदेव कहने लगे। बाद में जब हिंदी भाषी प्रदेशों से तथा भारत के अन्य भागों से लोग वहाँ पहुँचने लगे तब वहीं के लोगों का अनुसरण करते हुए अन्य लोग भी उन्हें गुरुदेव ही कहने लगे।
यहाँ तक तो हुई उनको गुरुदेव कहने की कहानी!

अब प्रश्न ये है कि क्या उनको गुरुदेव कहना उचित है?
   
सर्वप्रथम तो इसका उत्तर एक इंटरव्यू के दौरान स्वयं कानजी स्वामी ने ही दिया की वे कोई देव-शास्त्र- गुरु वाले गुरु तो हैं नहीं बस लोग उन्हें इस नाम से बुलाते हैं।
ये तो हुआ कानजी स्वामी का उत्तर,,,,

अब हम पुनः उक्त प्रश्न पर विचार करते हैं!
  क्या उक्त प्रश्न में गुरुदेव बोलने पर जो शंका व्यक्त की जा रही है वो देव शास्त्र गुरु वाले गुरु को सन्दर्भ में लेकर तो नहीं है? क्योंकि यदि ऐसा कोई सोचता है तो उसका सोचना बिल्कुल गलत है।
क्योंकि न तो कभी उनके अनुयायियों ने ही उन्हें कभी निर्ग्रन्थ गुरु की तरह गुरु माना और न ही स्वयं कानजी स्वामी ने। वे तो स्वयं को एक गृहस्थ ही कहते थे। इसलिए उनको निर्ग्रन्थ गुरु की तरह गुरुदेव कहते हैं ऐसी शंका बिल्कुल निराधार है।
     अब कहने वाले तो कल को ये भी कहेंगे कि उनके पीछे स्वामी क्यों लगाते हो, फिर कहेंगे कि कानजी में "जी" क्यों लगाते हो।
   कमाल है! अब अगर किसी का नाम ही ऐसा है तो इसमें हम क्या कर सकते हैं।
   मान लीजिए हम कानजी स्वामी को पहले नहीं जानते थे जब हमने उनके प्रवचन सुने और उनको जानने पहचानने लगे तो अब हम उनको किस नाम से बुलायें???
चूँकि वे हमसे बड़े हैं ज्ञानी हैं तो उन्हें उनके नाम से तो बुला नहीं सकते थे। उनको ब्रम्हचारी जी, पंडित जी ऐसा कुछ बुलाना पड़ता। हम ऐसा ही कुछ बुलाते भी अगर वे हमारे यहाँ पहले आये होते तो। लेकिन वे वहीं गुजरात में ही रहे तो वहाँ के लोग उनको जिस नाम से बुलाते रहे उसी नाम से हम भी बुलाने लगे।
   अब क्या आप उनको उनके नाम से ही बुलाते? मान लीजिए आप गणित की कक्षा में बैठे हैं, आपको कोई सवाल नहीं आ रहा है तो आप अपने शिक्षक से क्या कहेंगे कि "ये कालीचरण वो सवाल हमको समझाओ"  ऐसा तो नही कहेंगे न। ऐसा कहेंगे कि " गुरुजी हमे वो सवाल समझा दीजिये"। अब हम आपसे पूछेंगे की आपने कालीचरण को गुरुजी क्यों कहा तो आप यही तो कहेंगे कि यहाँ सब विद्यार्थी उनको इसी नाम से बुलाते हैं इसलिए हम भी उनको गुरुजी ही बुलाते हैं।अब गुरुजी का मतलब वो कोई निर्ग्रन्थ गुरु थोड़े न हो गए।
    बस इसीतरह तो कानजी स्वामी के सम्बंध में हुआ। जब यहाँ से लोग वहाँ उनको सुनने पहुँचे तो वहाँ के लोग उन्हें गुरुदेव गुरुदेव कहकर बुलाते थे तो बाकी लोग भी उनको गुरुदेव ही कहने लगे।
तो ये एक संज्ञा मात्र है, नाम मात्र है। उनको हमने कोई निर्ग्रन्थ गुरु की तरह गुरु माना हो ऐसा नहीं है। वे मात्र एक स्कूल शिक्षक की तरह विद्यागुरु ही हैं।
      खैर सवाल उठाने वालों का क्या है! वे तो कल ये भी कहने लगेंगे की
@ *गुरुदेव* रवीन्द्रनाथ टैगोर को गुरुदेव क्यों कहते हो???
@ *स्वामी* विवेकानंद को स्वामी क्यों कहते हो???
@ सुब्रमण्यम *स्वामी* को स्वामी क्यों कहते हो???

अरे भैया ये नाम हैं। अब इनके नाम ही ये हैं तो हम क्या करें?उनको उनके नाम से नहीं बुलायें तो क्या आपके नाम से बुलायें?
   अब कानजी स्वामी ये उनका नाम है तथा जैसे पिताजी, दादाजी, गुरुजी ये सम्मानजनक संज्ञायें हैं वैसे ही कानजी स्वामी की भी *गुरुदेव* ये एक वैसी ही संज्ञा है। उनको कोई निर्ग्रन्थ गुरु नहीं माना गया है।

खैर मानने वाले अपने हिसाब से मानते रहेंगे पूछने वाले हमेशा प्रश्न पूछते रहेंगे। जो समझना चाहता होगा वो जरूर समझेगा वरना जिनको विवाद करना है उनको कैसे भी समझायें वे नही समझेंगे।

इत्यलम्
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