*कानजी स्वामी को गुरुदेव कहना कितना सही?*
*कानजी स्वामी* जैन जगत में पिछले 50 वर्षों में सबसे ज्यादा प्रभावी नाम जिसने जैन समाज को एक नवीन दृष्टि प्रदान की तथा समस्त कर्मकांडों की होली जलाते हुए जैनियों को उनकी अमूल्य निधियों से अवगत कराया।
प्रारम्भ में तो ये श्वेतांबरों के मुखपट्टीधारी मुनि रहे किन्तु कालांतर में मोक्षमार्गप्रकाशक एवं समयसार जैसे ग्रन्थों के मिलने पर तत्त्वबोध हुआ और उन्होंने मुखपट्टी छोड़कर श्वेताम्बर मुनिपद का त्याग किया तथा दिगम्बर धर्म को स्वीकार किया।
दिगम्बर धर्म में आगमन के समय ये गुजरात में ही निवासरत थे जहाँ श्वेतांबरों की ही प्रधानता है। इन्होंने श्वेताम्बर मुनिपद एवं मुखपट्टी दोनों का ही त्याग कर दिया था। और एक सामान्य गृहस्थ की भाँति ही जीवन व्यतीत कर रहे थे। परंतु जीवन भर ब्रम्हचर्य का पालन करते हुए आ रहे थे तो अभी भी ब्रम्हचारी ही थे और श्वेत वस्त्र धारण करते थे तो उनसे कुछ श्रद्धा में तो बिगाड़ था नहीं सामान्य वेश ही था तो श्वेत वस्त्र भी धारण करते रहे।
गुजरात के कुछ लोग जिनको ये पता था कि ये साधु थे तो सामान्य जन अभी भी उन्हें श्वेत वस्त्र देखकर साधु ही समझते थे किंतु वे तो स्वयं को एक ब्रम्हचारी ही मानते थे साधु नहीं।
वे वहीं रहकर स्वाध्याय करते तो कुछ लोग उनके पास आकर स्वाध्याय सुनने लगे। वहाँ प्रारम्भ में जो लोग आये वे उन्हें सामान्य शिष्टाचारवश गुरुदेव कहने लगे। बाद में जब हिंदी भाषी प्रदेशों से तथा भारत के अन्य भागों से लोग वहाँ पहुँचने लगे तब वहीं के लोगों का अनुसरण करते हुए अन्य लोग भी उन्हें गुरुदेव ही कहने लगे।
यहाँ तक तो हुई उनको गुरुदेव कहने की कहानी!
अब प्रश्न ये है कि क्या उनको गुरुदेव कहना उचित है?
सर्वप्रथम तो इसका उत्तर एक इंटरव्यू के दौरान स्वयं कानजी स्वामी ने ही दिया की वे कोई देव-शास्त्र- गुरु वाले गुरु तो हैं नहीं बस लोग उन्हें इस नाम से बुलाते हैं।
ये तो हुआ कानजी स्वामी का उत्तर,,,,
अब हम पुनः उक्त प्रश्न पर विचार करते हैं!
क्या उक्त प्रश्न में गुरुदेव बोलने पर जो शंका व्यक्त की जा रही है वो देव शास्त्र गुरु वाले गुरु को सन्दर्भ में लेकर तो नहीं है? क्योंकि यदि ऐसा कोई सोचता है तो उसका सोचना बिल्कुल गलत है।
क्योंकि न तो कभी उनके अनुयायियों ने ही उन्हें कभी निर्ग्रन्थ गुरु की तरह गुरु माना और न ही स्वयं कानजी स्वामी ने। वे तो स्वयं को एक गृहस्थ ही कहते थे। इसलिए उनको निर्ग्रन्थ गुरु की तरह गुरुदेव कहते हैं ऐसी शंका बिल्कुल निराधार है।
अब कहने वाले तो कल को ये भी कहेंगे कि उनके पीछे स्वामी क्यों लगाते हो, फिर कहेंगे कि कानजी में "जी" क्यों लगाते हो।
कमाल है! अब अगर किसी का नाम ही ऐसा है तो इसमें हम क्या कर सकते हैं।
मान लीजिए हम कानजी स्वामी को पहले नहीं जानते थे जब हमने उनके प्रवचन सुने और उनको जानने पहचानने लगे तो अब हम उनको किस नाम से बुलायें???
चूँकि वे हमसे बड़े हैं ज्ञानी हैं तो उन्हें उनके नाम से तो बुला नहीं सकते थे। उनको ब्रम्हचारी जी, पंडित जी ऐसा कुछ बुलाना पड़ता। हम ऐसा ही कुछ बुलाते भी अगर वे हमारे यहाँ पहले आये होते तो। लेकिन वे वहीं गुजरात में ही रहे तो वहाँ के लोग उनको जिस नाम से बुलाते रहे उसी नाम से हम भी बुलाने लगे।
अब क्या आप उनको उनके नाम से ही बुलाते? मान लीजिए आप गणित की कक्षा में बैठे हैं, आपको कोई सवाल नहीं आ रहा है तो आप अपने शिक्षक से क्या कहेंगे कि "ये कालीचरण वो सवाल हमको समझाओ" ऐसा तो नही कहेंगे न। ऐसा कहेंगे कि " गुरुजी हमे वो सवाल समझा दीजिये"। अब हम आपसे पूछेंगे की आपने कालीचरण को गुरुजी क्यों कहा तो आप यही तो कहेंगे कि यहाँ सब विद्यार्थी उनको इसी नाम से बुलाते हैं इसलिए हम भी उनको गुरुजी ही बुलाते हैं।अब गुरुजी का मतलब वो कोई निर्ग्रन्थ गुरु थोड़े न हो गए।
बस इसीतरह तो कानजी स्वामी के सम्बंध में हुआ। जब यहाँ से लोग वहाँ उनको सुनने पहुँचे तो वहाँ के लोग उन्हें गुरुदेव गुरुदेव कहकर बुलाते थे तो बाकी लोग भी उनको गुरुदेव ही कहने लगे।
तो ये एक संज्ञा मात्र है, नाम मात्र है। उनको हमने कोई निर्ग्रन्थ गुरु की तरह गुरु माना हो ऐसा नहीं है। वे मात्र एक स्कूल शिक्षक की तरह विद्यागुरु ही हैं।
खैर सवाल उठाने वालों का क्या है! वे तो कल ये भी कहने लगेंगे की
@ *गुरुदेव* रवीन्द्रनाथ टैगोर को गुरुदेव क्यों कहते हो???
@ *स्वामी* विवेकानंद को स्वामी क्यों कहते हो???
@ सुब्रमण्यम *स्वामी* को स्वामी क्यों कहते हो???
अरे भैया ये नाम हैं। अब इनके नाम ही ये हैं तो हम क्या करें?उनको उनके नाम से नहीं बुलायें तो क्या आपके नाम से बुलायें?
अब कानजी स्वामी ये उनका नाम है तथा जैसे पिताजी, दादाजी, गुरुजी ये सम्मानजनक संज्ञायें हैं वैसे ही कानजी स्वामी की भी *गुरुदेव* ये एक वैसी ही संज्ञा है। उनको कोई निर्ग्रन्थ गुरु नहीं माना गया है।
खैर मानने वाले अपने हिसाब से मानते रहेंगे पूछने वाले हमेशा प्रश्न पूछते रहेंगे। जो समझना चाहता होगा वो जरूर समझेगा वरना जिनको विवाद करना है उनको कैसे भी समझायें वे नही समझेंगे।
इत्यलम्
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