"अस्थाई जीवन में स्थायी नौकरी की कल्पना"-
गज़ब*
आज कल स्थायी नौकरी का बड़ा ट्रेंड है। ये एक सामाजिक बीमारी की तरह है जो हमारे अच्छे विकास की दिशा में बाधक है। ये सामाजिक बीमारी हमारे समाज द्वारा ही फैलाई गयी है। यदि आपके पास स्थायीनौकरी है तो समाज में आपका एक अलग ही रुतबा, अलग ही सम्मान होता है। जबकि अस्थायी नौकरी वाले व्यक्ति की स्थिति कुछ दीन-हीन सी नज़र आती है। ये चीज हमारे आसपास के लोगों ने ही हमारे दिमाग में भर दी है कि अगर एक स्थायी नौकरी है तो आप योग्य हैं,सफल हैं और अगर आपके पास स्थायी नौकरी नहीं है तो आप असफल तो हैं ही साथ ही साथ आपको अयोग्यता का प्रमाण पत्र भी दे दिया जाता है। समाज के द्वारा दी गयी ये बीमारी व्यक्ति के, परिवार के विकास को तो खा ही जाती है साथ ही साथ ये देश के विकास को भी खा जाती है। इसके कारण कोई भी युवा एक सीमित दायरे में ही सोचने पर मजबूर होता है। वह उस सीमित दायरे से बाहर सोचने की हिम्मत भी नहीं कर पाता क्योंकि यदि वो ऐसा करता है तो ये समाज उसकी असफलता का, उसकी अयोग्यता का सर्टिफिकेट लिए ही बैठा है।अगर ये स्थाई नौकरी का चक्कर न हो तो हमारे देश का युवा बाहरी सीमाओं को तोड़कर, अपनी सीमाओं, क्षमताओं और रुचि को पहचानकर कुछ अलग ही कर सकता है।इस 70-80 साल की अस्थाई, अस्थिर, क्षणभंगुर जिंदगी में एक स्थायी नौकरी की कल्पना कितनी हास्यास्पद है। जब जिंदगी ही अस्थिर है तो नौकरी की स्थिरता कहाँ से हो सकती है। क्या स्थिरता 30- 40 साल का नाम है? यदि नहीं तो फिर स्थिर या स्थायी नौकरी की बात एकदम बेमानी है।इस स्थायी नौकरी के चक्कर की शुरुआत कहाँ से हुई? जब तक राजाओं का शासन था तब तक तो ऐसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था। राजा के यहाँ नौकरी जरूर होती थी लेकिन उसके स्थायित्व की कोई गारंटी नहीं होती थी। जब से हम आजाद हुए तभी से हमारी प्रतिभाओं को खाने वाली ये स्थायी नौकरी आयी है। इसका मतलब ये है कि ये एक सामाजिक बीमारी है जो हमने खुद अपने मस्तिष्क से पैदा की है।अगर आज हम देखें तो अमेरिका जैसे देशों में फ्रीलांस जॉब्स का चलन बढ़ा है। वहाँ करीब 4 करोड़ लोग इस तरह की नौकरी कर रहे है जबकिभारत में ऐसे काम करने वालों की संख्या 1 करोड़ ही है। इसीलिए हम आजादी के बाद भी इतने कम विकसित हैं।कोई युवा जब स्थायी नौकरी के पीछे भागता है तो वो औसतन अपने 25 वर्ष तो गँवा ही देता है। अब बाकी के 25 साल वो एक निश्चित दिनचर्या के हिसाब से अपना जीवन गुजार देगा। यदि वो खुद का मूल्यांकन करे कि उसने इस समाज को क्या दिया, खुद के लिए क्या किया तो शायद इस बात का उत्तर उसके पास न हो। या उत्तर में सिर्फ यही कह सकता है कि मेरे पास गाड़ी है, अपना घर है, बैंक बैलेंस है। और??? समाज के लिए,,,,परिवार के लिए आपने क्या किया??? कुछ नहीं!!हमें ये सोचना होगा कि यदि हमने जन्म लिया है तो क्यों जन्म लियाहै। क्या ये अमूल्य जीवन किसी की नौकरी करने के लिए है या फिर इस समाज को कुछ दे जाने के लिए है, अपने लिए कुछ अद्भुत सा काम करने के लिए है। जब हम मरें तो अपने आप से ये पूछें कि हमने पूरे जीवन भर क्या किया?? हम खुद क्या लेकर जा रहे हैं?? इस समाज को क्या देकर जा रहे हैं?यदि इन प्रश्नों का उत्तर आपके पास उस समय रहेगा तब तो आपका जीवनसार्थक रहा। लेकिन यदि आपने पूरी जिंदगी रोटी कमाई और खाई है तो इतना तो पशु भी कर लेते हैं फिर आपके जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा औऱ इस दुनिया को भी आपके जीने मरने से कोई फर्क नहीं पड़ताइसलिए हमें चाहिए कि हम लोगों की मानसिकता को बदलें। अपनी मानसिकता कोबदलें। स्थायी नौकरी मिलती है तो ठीक यदि नहीं मिलती है तो उसके पीछे भागना बन्द करें और कुछ ऐसा काम करें जिसमें आपकी रुचि हो और जिससे आप समाज के लिए कुछ दे सकें। यदि आप इतना नहीं कर सकते तो कम से कम इतना तो अवश्य करें कि किसी अस्थायी नौकरी वाले व्यक्ति को हतोत्साहित न करें, उसे उसका काम पूरी ईमानदारी के साथ करने दें। वरना ये स्थायी नौकरी का कॉन्सेप्ट हमारी प्रतिभाएँ खा जाएगा।
*आप क्या बन गये हैं ये महत्वपूर्ण नहीं है, आप समाज को क्या दे रहे हैं, दूसरों के लिए क्या कर रहे हैं ये महत्वपूर्ण है।*
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